हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,शिया हौज़ात ए इल्मिया के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल व्यक्तित्व नहीं रहते, बल्कि एक पूरे दौर, एक विचारधारा और एक परंपरा की पहचान बन जाते हैं आयतुल्लाहिल उज़्मा हुसैन वहीद ख़ुरासानी दाम ज़िल्लुह भी उन्हीं जगमगाते नामों में से हैं, जिनकी ज़ात इल्म व अमल, फ़िक़्ह व मारिफ़त और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के इश्क़ व अक़्ल का ख़ूबसूरत संगम है।
11 रजब सन 1339 हिजरी को निशाबूर की दीऩी और इल्मी फ़िज़ा में जन्म लेने वाली यह महान हस्ती आज क़ुम-ए-मुक़द्दस में तशय्युʿ की इल्मी विरासत की अमानतदार और फ़िक़्ह-ए-जाफ़री की मज़बूत स्तंभ बनकर जलवा-गर है।
आपका सफ़र-ए-इल्म निशाबूर से शुरू होकर रै, मशहद, क़ुम और नजफ़-ए-अशरफ़ जैसे महान इल्मी मराक़िज़ से गुज़रता हुआ इज्तिहाद के उच्चतम मुक़ाम तक पहुँचा और यही सफ़र दरअसल इख़लास, रियाज़त और मुसलसल जद्दोजहद की दास्तान है।
आयतुल्लाहिल उज़्मा वहीद ख़ुरासानी दामत बरकातुह ने केवल फ़िक़्ही नुसूस पर इक्तिफ़ा नहीं किया, बल्कि दीन के फ़िक्री और एतिक़ादी पहलुओं को भी उसी गहराई और संजीदगी के साथ बयान फ़रमाया, ताकि अक़ीदा और अमल के दरमियान मौजूद मज़बूत रिश्ता किसी पर पोशीदा न रहे।
आपके असातिज़ा में उस्तादुल फ़ुक़हा वल मुज्तहिदीन आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अबुलक़ासिम ख़ूई (र०ह०), आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद मोहसिन हकीम (र०ह०) और अन्य जलीलुल-क़द्र अकाबिर शामिल हैं, और आपकी शख़्सियत में इन तमाम इल्मी सिलसिलों की झलक नुमायाँ तौर पर दिखाई देती है।नजफ़ की इल्मी फ़िज़ा हो या क़ुम का हौज़ा—आप हर जगह तश्नगान-ए-इल्म के लिए चिराग़-ए-राह बने रहे।
क़ुम में आपका दर्स-ए-ख़ारिज़-ए-फ़िक़्ह व उसूल हौज़वी दुनिया के सबसे पुर रौनक़ और मोतबर दुरूस में शुमार होता है। यह दर्स केवल इल्मी बहस नहीं, बल्कि फ़िक्र, अदब, ख़ुशूʿ और ज़िम्मेदारी की ऐसी दरसगाह है जहाँ इल्म, तक़वा के साये में परवान चढ़ता है।
मरजइयत के मंसब पर फ़ाइज़ होने के बाद भी आपकी ज़िंदगी में सादगी, ज़ुह्द और इल्मी इन्हिमाक नुमायाँ रहा। आपकी तसानीफ़—चाहे फ़िक़्ह व उसूल में हों या अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की मज़लूमियत व अज़मत के बयान में—सब इस हक़ीक़त की गवाह हैं कि आपके क़लम में केवल इल्म ही नहीं, बल्कि दर्द-ए-दिल और इश्क़-ए-विलायत भी शामिल है।
आयतुल्लाहिल उज़्मा वहीद ख़ुरासानी दामत बरकातुह की शख़्सियत इस सच्चाई का ज़िंदा सबूत है कि जब इल्म, इख़लास और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से सच्ची मोहब्बत एकजुट हो जाएँ, तो इंसान केवल आलिम ही नहीं, बल्कि अहद-साज़ बन जाता है। आपका इल्मी और रूहानी सरमाया आज भी तशय्युʿ की फ़िक्री सरहदों की हिफ़ाज़त कर रहा है और आने वाली नस्लों को नूर-ए-हिदायत अता कर रहा है।
अलहम्दुलिल्लाह व लहुश शुक्र, 11 रजब 1339 हिजरी को धरती पर क़दम रखने वाली यह महान शख़्सियत आज 11 रजब 1447 हिजरी को 108 वर्ष की हो चुकी है। कमाल केवल यह नहीं कि आपकी उम्र-ए-मुबारक तूलानी है, बल्कि इस उम्र में भी आप इज्तिहाद और मरजइयत की ज़िम्मेदारियों को बेहतरीन ढंग से अदा फ़रमा रहे हैं।
इसी प्रकार हमारे अन्य मराजे-ए-किराम दाम ज़िल्लहुम भी, जो लगभग 100 वर्ष के क़रीब हैं, इस अहम ज़िम्मेदारी को कमाहक़्क़हु अदा कर रहे हैं—जबकि एक आम इंसान के लिए 60–70 वर्ष की उम्र में किसी सामान्य ज़िम्मेदारी को भी भली-भाँति निभा पाना मुश्किल हो जाता है, और इसलिए उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया जाता है।
अतः मराजे-ए-किराम दामत बरकातहुम की तुलना किसी आम इंसान से नहीं की जा सकती। जब अइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम के आम नायबों से तुलना संभव नहीं, तो स्वयं मासूम से तुलना कैसे संभव होगी? जैसा कि अमीरुल मोमिनीन (अ.) का फ़रमान है:“ला युक़ासु बि आलि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम) मिन हाज़िहिल उम्मतِ अहदٌ।
लेखक: सैयद अली हाशिम आबिदी
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